भूख

आज लॉक डाउन ३ की शुरुआत, मैं कुछ ज़रूरी खाने का सामान लेने बाहर सड़क पे निकला ही था कि जन समूह ने घेर लिया मुझे, गुहार थी की कुछ सामान दिला दो खाने का, या कुछ पैसे दे दो। नहीं-नहीं भिखारी नहीं थे, गलती ना करें भिखारी समझ कर, वो बस उनकी और उनके बच्चों की भूख उन्हें सड़क तक ले आयी थी। कोई रो रहा था साहब बच्चे भूखे हैं और कुछ कांपते हांथो को आगे बढ़ा रहे थे, शायद मन में ये विचार था की भिखारी ना समझ लूँ मैं। सोसाइटी का गार्ड दूर से चिल्लाते हुए आया की दूर दूर खड़े रहो सब, काम था उसका पर वो भी ये जानता था कि भूख कोरोना से बड़ी होती है। भीड़ सहम के दूर कड़ी हो गयी।

मैंने गार्ड भैया से पूछा “जानते हो इन्हें”
“हां साहब, पास के गांव से हैं, घरों में काम करती थीं और कुछ फैक्ट्री में”
“थीं मतलब ?”
“मतलब साहब, महामारी नौकरी को खा गयी, और भूख अब इनको खा रही है”

मैंने पास वाले दुकान से उनको ज़रूरी सामान दिलाया, और वो अपनी टूटी इंग्लिश मैं “Thank you” बोल के चली गयीं। किसी ने थन्कु बोला किसी ने भैया सलामत रहो और किसी ने अश्रुपूर्ण आँखों से हाँथ जोड़े, शब्द नहीं थे उनके पास और मेरी आँखों में आंसू। शायद इतना स्पेशल “Thank you” आजतक नहीं मिला था।

ये कहानी नहीं है और ना ही मैंने अपनी तारीफ़ के लिए लिखा, ये तकलीफ़ है, जो उनके साथ थी और मैंने महसूस की। लौटते हुए ये प्रश्न विचलित कर रहा था कि ये हालत लोगों की, और हम कितने अनपढ़ हो चुके हैं कि कोई हमसे ताली बजाने को कहता है या दिए जलाने को तो हम पूछते भी नहीं की, जिनके घर खाने के लिए तेल नहीं बचा वो दिए कैसे जलाएंगे। हम नहीं पूछते की जो एक वक़्त भूखे सोते थे उनके घर खाना पहुंचेगा या नहीं।

अब भी समय है जागिये और मदद कीजिये, वो लोग भी हमारे और आप जैसे हैं, जिनके पास कल नौकरी थी ख़ुशी थी अब उनके पास सिर्फ भूख बची है। और वो भूख उनको खा रही है। पूछिए सवाल सत्ता से की लोग भूखे क्यों है। शायद आपकी कहानी और आपका सवाल ही उनको जगा दे।

थाली, ताली, दिया, रंगोली, होली सब मनाइये, पर क्या इससे महामारी जाएगी अगर नहीं तो वो करिये जिससे ये जायेगी और डेमोक्रेसी में शासक आप हैं, तो बोलिये सत्ताधारियों को की आगे बढ़ें और वो करें जिससे लोग इस महामारी से बच जाएँ।

कहीं ऐसा ना हो की भूख भी महामारी बन जाए।

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