मेरी कहानी (Meri Kahani)

कुछ जानी, कुछ पहचानी, एक अनबूझ सी कहानी। कुछ नहीं से कुछ होने की कहानी। अंधेरों के रौशनी में डूबने की कहानी। कहानी वो जिसमें पारस पत्थर भी है और डूबती कश्ती भी। कहानी वो जिसमें सपना भी है और सपने को जीने का हौंसला भी। कहानी वो जिसमे मैं तुमसे जुड़ता हूँ। मेरे मैं और मय के मुझमें हम बनने की कहानी। ये मेरी, नहीं-नहीं तुम्हारी, नहीं हमारी कहानी है। ज़िन्दगी ने सफ़्हा समझ घडी की सुइयों से उकेर दिया मेरे जिस्म पे ये ऐसी कहानी है।

एक लम्हा था लोगों की खुशियों का और मेरे खुश दिखते रहने का। गुजरते वक़्त सा दाखिल हुआ था मैं उसकी ज़िन्दगी में, बस दो घडी और फिर कभी नहीं। कुछ हंसी फैली थी, कुछ महकी थी हवा। अचानक से सब कुछ बदलने लगा था, कोई ऐसा आया था ज़िन्दगी में जिसके पास होने से ही मैं कुछ अलग महसूस करने लगा था। हवाएं बदल रही थी मेरे आसपास और मैं भी बदल रहा था बहुत तेज़ी से। कुछ बातें, कुछ रातें और कुछ-कुछ अपना सा मेरे अंदर करवटें ले रहा था। वो कुछ लम्हे के लिये दाखिल हुई थी और लम्हा दिनों फिर सालों में बदलने वाला था और मैं अंजान उस लम्हे को जी रहा था। महसूस कर रहा था वापस खुद में खुद को कुछ-कुछ अपने जैसा। दिन कब लम्हों में गुजर जाते हैं पहली बार महसूस हुआ। फिर घडी आयी उस लम्हे के भी खत्म होने की, आँखे डबडबा गयीं थी पर जानता नहीं था कि अब जो तुम आयी हो तो जाने के लिए नहीं। कुछ मेरी कुछ अपनी कुछ हमारी कहानी बुनने के लिए। वो रात कितनी भारी थी तुमको बताना मुश्किल है। फिर एक और दौर, बातें बातें और बातें। कुछ कहना कुछ सुनना और सिर्फ सुनते रहना। घंटो तक, और फिर इंतज़ार अगले दिन का। हम खुशियाँ ढूंढने निकले थे या फिर खुशियाँ हमको ढूँढ रहीं थी बताना मुश्किल। शायद खुशियों ने ही ढूँढा था हमें। दिन को घंटो में बयां करते रहना और एक दूसरे को महसूस करना कब सीख लिया पता ही नहीं चला।

वक़्त बदल रहा था और मैं भी। इतनी दूर होकर भी यहां से वहां तक तुमको महसूस कर लेना तुम्हारी सारी परेशानियों से कहानी गढ़ लेना, और वैसा ही कुछ तुम्हारे साथ भी था इतनी दूर से मेरी आत्मा की आवाज़ पढ़ लेती थी। कुछ कुछ बदल रहा था और बहुत कुछ अलग था। फिर घड़ी आयी वापस मिलने की, जब पहली बार बिछड़ा था तुमसे तो उम्मीद नहीं थी और गुंजाइश भी नहीं कि ये घड़ी वापस पलट के आयेगी, ये सोच से बाहर था मेरी।पर किस्मत जिसको मैने अपनी ज़िन्दगी के हिस्से की स्याही नहीं दी कभी वो कुछ-कुछ लिख रही थी। धीरे-धीरे वापस वही एहसास। मैं खींचा जा रहा था तुम्हारी ओर जैसे धार में फंस जाय कोई और बहता रहे, ऐसा नहीं कि कोशिश नहीं की बाहर आने की। वैसे ये भी सवाल है कि कोशिश क्यों की, पर की। धार बहुत तेज़ थी नदी के जैसी, कमाल ये के डूबते भी ना बने और निकलते भी नहीं।

शायद कुछ-कुछ ऐसा ही तुम्हारे साथ भी था। कब तुम्हारे आगोश में बह गया पता ही नहीं चला। फिर वो पहला किस जो अंजाने में हुआ जो कितने दिनो तक मुझे कचोटता रहा, डराता रहा, मेरी गलती तस्दीक करता रहा, पता नहीं था कि वो इस रिश्ते की बुनियाद को रख देगा, एक नई कहानी बुन देगा जो मेरे तुम्हारे और शायद सभी बुद्धिजीवियों की समझ के बाहर होगी। फिर से बिछड़ने का वक़्त आ गया, और फिर से कहानियों का नया दौर। हम कोरे कागज़ पे रोज़ नई कहानियां बुनते थे, इतनी मोटी किताब बन सकती है अंदाज़ा लगाना मुश्किल शायद किसी भी वेद, पुराण, गीता, कुरान, बाइबल से भी मोटी।

कुछ बचपना, कुछ खुशियां और कुछ गम भी थे। कुछ तुम्हारे, कुछ मेरे और कुछ हम दोनों के। कितने दिनो से छुपा रखा था मैंने खुद को दुनिया से, पर धीरे-धीरे वो सारी गिरहें तुम्हारे प्रेम के हवन कुंड में जलती जा रहीं थीं और एक नया मैं बनता जा रहा था, एक अंजान मैं दुनिया के लिए, पर यही तो सच था बाकी सब झूठ। मैं जिनको बुरा सपना समझ खुद से भी छुपाता था, जाने क्यों सब तुमको बयां कर दिया धीरे-धीरे। एक रिश्ता आया था जो कशिश के साथ आया वापस नहीं जाने के लिए, मुझे परेशानियों से बचाने के लिए, मुझे मैं बनाने के लिए। फिर तुम्हारा जिक्र करना के तुम लिखते हो तो बयां कर दो ना कागज़ पे कुछ, बुन दो ना एक रिश्ता, एक एहसास या फिर एक कहानी। शायद वो मेरी नई जिन्दगी की शुरुआत थी। एक सपने के शुरुआत की कहानी फिर से बयां हो रही थी, वो सपना जो छूट गया था और मैं भी क्योंकि वो सपना ही मैं था।

धीरे-धीरे कुछ-कुछ उकेरना शुरू किया कुछ लफ़्ज़ों को, कुछ लम्हों को, कुछ सपनों को, कुछ दर्दों को, कुछ खुशियों को, कभी सहनशीलता को, कभी क्रोध को, कैसे लिखता हूं मैं ये आज भी बयां नहीं कर सकता। हां तुमको पसंद था इसलिए लिखता था। कोई पूछे तो बता नहीं पाऊंगा। सच बस इतना है कि मैं लिखता हूं और तुम सामने होती हो, जैसे मंदिर में पुजारी का धर्म होता है पूजा करना। मेरा धर्म बन गया था लिखना तुमको सामने रख के तुमसे जुड़ के, तुमको सोच के।

फिर तुमसे बयां करना अपना प्यार और डरते रहना की कहीं ये कहानी खत्म ना हो जाए। क्या मैं फिर से गुम तो नहीं हो जाऊंगा? मेरे इर्द गिर्द और भी कहानियां थी कभी कहानियों में कभी कविताओं में और बदल रही थी मेरे इर्दगिर्द दुनिया जिनके खोने का डर दर्द देता था।

शायद किस्मत का फैसला कुछ और था। क्योंकि पहले ये कहानियां भागती थी दूर, एक दूजे से, मुझसे। पर अब कुछ अलग रिश्ता बुन गया था, अब इनका दूर रहना मुश्किल था। एक अजनबी की कहानी जो अब अपने जैसे लगने लगी थी। एक अलग सी खुशी को जीने लगा मैं। याद है वो मेरा सरप्राइज मेरी पहली किताब। वो खुशी लफ़्ज़ों में जोड़ नहीं सकता। जब वो पहली किताब पूरी की तो पर लग गए थे मुझे, मुश्किल है बताना उस एहसास को जो जिया था मैंने उस रोज़। मेरी कहानियों में, मेरे शब्दों में, मेरे लफ़्ज़ों में जो शायद तुमसे मिले।मुझे पर लग गए थे, हमेशा उड़ने के लिए, तुम्हारा मेरे प्रेम को स्वीकार कर लेना। कुछ अलग हो रहा था मेरे साथ, मेरी सोच से बाहर, सपनों के जैसा, एक नई कहानी। वो एक गीत सार्थक है ना मेरे प्यार पर “तुम्हीं से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले”।

फिर वो दूरी जिसमे हमने शिद्दत से प्यार को बचा के रखा हमने, के उन दूरियों का पता नहीं चला। प्यार पनपता रहा बेल के जैसा धीरे-धीरे, फैलता रहा, जकड़ता रहा। हमारे जिस्म के, खुशियों के, सपनो के इर्द गिर्द और फिर इतना कस के जकड लिया के चाहूँ तो भी वापस नहीं जा सकता और शायद वापस जाना भी नहीं चाहता क्योंकी अब उस बेल के सहारे ही खड़ा हूँ। फिर तुमसे मिलना और धीरे धीरे अपनी बची गिरहों को तुम्हारे सामने खोलना, कितना मुश्किल था वो लम्हा पर उतना ही सुखद। कितने दिनों से झूठ का चश्मा मैं लोगों को पहनाता रहा। तुम वो पहली और आखरी कड़ी वो जिसको ये पता है कि मैं कौन हूँ, क्या हूँ, और कैसे हूँ। तुमने मुझे बिन जाने स्वीकार किया था वो सपने जैसा था। मैं अपने दर्द को अपना हथियार बना के तुमसे प्यार नहीं कर कर सकता था।

कुछ अलग रिश्ता था हमारे बीच कुछ एहसासों का जो हमको जोड़ता है। एक दूजे में गुम होने की कहानी, एक दूजे को प्यार करने की कहानी, एक दूजे के ताक़त बनने की कहानी। धीरे-धीरे प्यार आगे बढ़ा दूरियों से बने शब्दों और उन शब्दों को तोड़ नए शब्दों के बनने की कहानी। हम एक दूजे के लिए काफी हैं हमको शायद नहीं पता था पर हमारे मन को पता था। वो रिश्ता जो मैंने नहीं बुना, जो तुमने नहीं बुना, मन को मन से बांधने की कहानी। लफ़्ज़ों, कहानियों, कविताओं के साथ चलने की कहानी। कदम से कदम मिला के कैसे चलते हैं ये तुमसे सीखा है मैंने, वरना भागते-भागते मैं खुद से भागने लगा था। वो मैं नहीं था पर वो किसी और कहानी का किरदार था जो मेरी कहानी में आ गया था और मैं उस किरदार में गुम हो गया था। वो टूट गया था, छूट गया था, गुम गया था, मैं वो नहीं।

मैं वो हूँ जो खुद कहानी लिखता है, जो जोड़ता है शब्दों को, लम्हों को, किरदारों को, दर्दों को, खुशियों को, भावनाओं को। मैं ये हूँ , वो कोई और था। और ये रिश्ता ही तो हमको जोड़ता है, प्यार का, एहसास का, भरोसे का, विश्वास का, कहानी का, है ना अजीब ये रिश्ता एक कहानी का, जो एक कहानी से शुरू हुआ और कहानी के साथ ही आगे बढ़ता रहता है। मैंने तुमको पाया ये मेरा नसीब है, तुमने मुझको शायद ये तुम्हारा नसीब है। जैसा भी है बहुत प्यारा है एक दूसरे से जुड़ने का रिश्ता। ऐसी कहानी जो जितनी बार भी चाहो मैं बयां करना चाहूंगा, पढ़ना चाहूंगा,जिक्र करना चाहूंगा, तुममे खोना चाहूँगा। वो छोटा सा घर जो तुमने खुद में दिया है। जिसमें मैं तुम और हमारे एहसास हैं। ये उनकी कहानी हैं। ये कहानियों के जुड़ने और उनके रिश्तों जैसे बढ़ने की कहानी है।

ये मेरी, तुम्हारी और हमारी कहानी है।

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