A Hindi short story of a boy and his dog, their unimaginable love with a life lesson.

छोटा था मैं , यही कोई पाँच साल का। बाबा एक कुत्ता लाये थे, किसी दोस्त ने दिया था उन्हें।

माँ ने गुस्से से पूछा उनसे , ” ये क्या लाये हो, इसकी देखभाल कौन करेगा ? मेरे से नहीं होगा। “
बाबा ने धीरे से कहा ,” तेजस को पसंद है ना। “
माँ का गुस्सा बढ़ गया ,” पसंद तो उसे फाइटर प्लेन भी है , ले आओ “

बाबा कुछ नहीं बोले, धीरे से मेरी तरफ बढ़ा दिया। मैंने बड़ी वाली स्माइल के साथ उसे अपने हांथों में लिया। उसके नर्म रोएं , उसका प्यार से मेरी तरफ देखना। मैं बहुत खुश था। वो मेरी उँगलियों को स्वाद लेकर चाट रहा था और माँ का पारा चढ़ता जा रहा था।

“देखो कैसे चाट रहा है , इन्फेक्शन हो गया तो। “
“कुछ नहीं होगा ” बाबा मेरी मेरी खुशियों में डूबे हुए थे।
“जो मर्ज़ी करो, सुनता कौन है मेरी। मेरे किचेन में नहीं दिखना चाहिये ये ” माँ का स्वर बढ़ गया था।

ना बाबा ने, ना मैंने उनकी बातों की तरफ ध्यान दिया, वो भुनभुनाती हुई अन्दर चली गयीं।
मुझे कुत्ते बहुत पसंद थे, मैं खेल रहा था उसके साथ। उसके ऊपर हाँथ रखना, उसे किस करना। मैं बहुत खुश था, बाबा चेयर पे बैठे मुझे निहार रहे थे।

“इसका नाम क्या रखोगे “
“बाबा मैं इसका नाम डॉबी रखूँगा “
“वो क्यों “
“वो हैरी पॉटर वाला डॉबी मुझे बहुत पसंद है “
“अच्छा नाम है “

बाबा की सहमती मिल गयी थी तो मेरी खुशियां और बढ़ गयीं।

दिन बीते और हमारा प्यार बढ़ता गया, मुझे उसके साथ रहना और खेलना बहुत पसंद था। उसे वॉक पे ले जाना, उसके साथ घूमना, और कभी-कभी एक ही बिस्तर पे सो जाना। डॉबी अब माँ को भी पसंद आने लगा था। मेरा ख्याल जो रखता था, और उसके आने के बाद मैं उसके साथ बिजी होता तो तंग भी कम करता था माँ को।

मेरा दोस्त फैयाज़ जो पास में ही रहता था , वो भी डॉबी को बहुत पसंद करता था। उसके दादू जॉन हमेशा कहते थे, कि कुत्ते शिकारी नस्ल (Breed) के होते हैं। माँस खिलाया करो। पर मैं कुत्ते वाली बात से चिढ जाता था, उसका नाम डॉबी जो था।

मैंने बाबा से बोला भी, हंसने लगे बोले।,”कुत्ते को कुत्ता ही तो कहेंगे”
“आप को लोग आदमी क्यों नहीं कहते, नाम क्यों लेते हैं?”

जवाब नहीं था उनके पास , मैंने भी गुस्से में दो घंटे बात नहीं की बस डॉबी के साथ खेलता रहा।
दो घंटे बाद पास आकर बोले,”अच्छा बाबा मैं फैयाज़ के दादू जॉन से बात करूँगा “

मैं बहुत खुश था, अब सब लोग उसे डॉबी बुलायेंगे। रात अच्छी बीती ख़ुशी में।

लेकिन शायद भगवन नहीं चाहता था कि दादू जॉन डॉबी को उसके नाम से बुलाएं। अगली सुबह खबर आयी वो नहीं रहे। फ़ैयाज़ मुझे गले लगा के बहुत देर-तलक रोया था। और मैं भी। बहुत प्यार करते थे, हम दोनों को बिना किसी भेद भाव के। जो भी फ़ैयाज़ के लिये आता, मेरे लिए भी लाते थे। खैर अब वो नहीं थे, डॉबी भी रोया था।

उनके फ़ातिहे(cremation) में मैं भी गया था बाबा के साथ। लोगों ने ज़मींदोज़ कर दिया था।

मैंने घर आके बाबा से पूछा, “ज़मीन में क्यों गाड़ दिया दादू जॉन को , क्या अब वो पेड़ बन जायेंगे ?”
बाबा हंसने लगे, पास बुलाया, बैठाया, बोले , “तेजस जब कोई मर जाता है तो उसे ज़मीन में दफ़न कर देते हैं “
“तो मेरे दद्दू मरे थे तो उनको कहाँ दफनाया , मुझे देखना है “
बाबा फिर हंस पड़े बोले , “नहीं , हम हिन्दू हैं हमारे यहाँ मरने के बाद जला देते हैं “
“फिर फ़ैयाज़ क्या है “
“मुसलमान”

ज्यादा समझ तो नहीं आया पर हिन्दू और मुसलमान का फ़र्क पता चल गया था।

इस बात को साल बीत गए। फ़ैयाज़, डॉबी और मैं बॉल से खेल रहे थे, मेरी फेंकी बॉल सड़क पार चली गयी, डॉबी दौड़ा बहुत तेज़। एक गाड़ी ने पूरे ब्रेक मारे, चूं की तेज़ आवाज़ आयी और मेरी चीख़ निकल गयी। डॉबी टकरा गया था गाड़ी से। मैं दहाड़े मार के रोने लगा और फ़ैयाज़ भी। सारा मोहल्ला इकट्ठा हो गया था। किसी ने बाबा को ऑफिस फ़ोन किया। वो घर आये , काफी देर मेरे और फ़ैयाज़ के पास बैठे रहे. हमें चुप कराया। फिर बाबा डॉबी को लेके चल दिए, मैं और फ़ैयाज़ उनके पीछे हो लिए बिना कुछ पूछे। थोड़े दूर रेलवे-लाइन के पास वाली हमारी ज़मीन पे उसे दफ़न कर दिया।

मैं और फ़ैयाज़ रोते हुए वापस आ गए। मैं पूरी रात माँ की गोद में पड़ा रोता रहा, अगली सुबह स्कूल भी नहीं गया। अगले दिन बाबा पत्थर का एक टुकड़ा लाये , जिसपे डॉबी लिखा था अंग्रेज़ी में। मैंने ज़ोर ज़ोर से पढ़ा , “D O B B Y”

बाबा , फ़ैयाज़ और मैं शाम को फिर रेलवे-लाइन के पास गए और वो पत्थर गाड़ दिया जहाँ डॉबी दफ़न था। आते वक़्त मेरे दिमाग में सवाल गोते लगा रहा था सो बाबा से मैंने पूछ लिया।

“बाबा डॉबी भी मुसलमान था क्या”
बाबा ने बड़े अनमने मन से पहले फ़ैयाज़ की तरफ देखा फिर मेरी तरफ, बोले “नहीं उसका कोई धर्म नहीं था “
बाबा को ऐसे चिंतित मैंने कभी नहीं देखा, इसलिए आगे न पूछ पाया उनसे कि हमने दफ़न क्यों किया।

समय को पंख लगे आगे बढ़ गया। अब भी जाता हूँ मैं कभी कभी डॉबी से मिलने। उसका प्यार अब भी ज़िंदा है। डॉबी तो मर गया पर सवाल अब भी ज़िन्दा है कि डॉबी मुसलमान था क्या?

डॉबी तो मर गया पर सवाल अब भी ज़िन्दा है कि डॉबी मुसलमान था क्या?

Posted by Tejas

4 Comments

  1. This is my favourite….such a sweet story with a strong message and feelings….

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    1. Thanks Ramit

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  2. Sooooo beautiful story….. innocence of a child’s mind….

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    1. Thanks, Madhumita

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